Friday, December 17, 2010

स्‍मारक

                                                         गेटवे ऑफ इंडिया 


गेटवे ऑफ इंडिया अब मुम्‍बई शहर का पर्यायवाची बन गया है। यह मुम्‍बई का सबसे अधिक प्रसिद्ध स्‍मारक है और यह शहर में पर्यटन की दृष्टि से आने वाले अधिकांश लोगों का आरंभिक बिन्‍दु है। गेटवे ऑफ इंडिया एक महान ऐतिहासिक स्‍मारक है, जिसे देश में ब्रिटिश राज के दौरान निर्मित कराया गया था। यह पंचम किंग जॉर्ज और महारानी मेरी के मुम्‍बई (तत्‍कालीन बंबई) आगमन के अवसर पर उन्‍हें सम्‍मानित करने के लिए बनाया गया विशाल स्‍मारक था। गेटवे ऑफ इंडिया का निर्माण अपोलो बंदर पर कराया गया था जो मेल जोल का एक लोकप्रिय स्‍थान है। इसे ब्रिटिश वास्‍तुकार जॉर्ज विटेट ने डिजाइन किया था।

गेटवे ऑफ इंडिया की आशाशिला बम्‍बई (मुम्‍बई) के राज्‍य पाल द्वारा 31 मार्च 1913 को रखी गई थी। यह स्‍मारक 26 मीटर ऊंचा है और इसने 4 मीनारें हैं और पत्‍थरों पर खोदी गई बारीक पच्‍चीकारी है। इसका केवल गुम्‍बद निर्मित करने में 21 लाख रु. का खर्च आया था। यह भारतीय - सार्सैनिक शैली में निर्मित भवन है, जबकि इसकी वास्‍तुकला में गुजराती शैली का भी कुछ प्रभाव दिखाई देता है। यह संरचना अपने आप में ही अत्‍यंत मनमोहक और पेरिस में स्थित आर्क डी ट्रायम्‍फ की प्रतिकृति है।

पिछले समय में गेटवे ऑफ इंडिया का उपयोग पश्चिम से आने वाले अतिथियों के लिए आगमन बिन्‍दु के रूप में होता था। विडम्‍बना यह है कि जब 1947 में ब्रिटिश राज समाप्‍त हुआ तो यह उप निवेश का प्रतीक भी एक प्रकार का स्‍मृति लेख बन गया, जब ब्रिटिश राज का अंतिम जहाज यहां से इंग्‍लैंड की ओर रवाना हुआ। आज यह उपनिवेश काल का संकेत पूरी तरह से भारतीय कृत हो गया है, जिसमें ढेरों स्‍थानीय पर्यटक और नागरिक आते हैं। मुम्‍बई का यह स्‍थान शहर के दर्शनीय स्‍थलों में से एक है।

गेटवे विशाल अरब सागर की ओर बनाया गया है, जो मुम्‍बई शहर के एक अन्‍य आकर्षण मेरिन ड्राइव से जुड़ा है, यह एक सड़क है जो समुद्र के समानांतर चलती है। यह भव्‍य स्‍मारक रात के समय देखने योग्‍य होता है जब इसकी विशाल भव्‍यता समुद्र की पृष्‍ठभूमि में दिखाई देती है। इसमें प्रतिवर्ष दुनिया भर के लाखों लोग आते हैं और यह मुम्‍बई के लोगों की जिंदगी का एक महत्‍वपूर्ण स्‍थान है, क्‍योंकि यह शहर की संस्‍कृति को परिभाषित करता है, जो ऐतिहासिक और आधुनिक सांस्‍कृतिक परिवेश का अनोखा संगम है।

                               गोलकोंडा किला


भारत एक गहरे इतिहास वाला देश है। यहां की समृद्ध सांस्‍कृतिक विरासत ने सभी को सम्‍मोहित कर रखा है। भारत के सभी राज्‍यों में कोई न कोई सांस्‍कृतिक इतिहास अवश्‍य है। यदि आपको कभी हैदराबाद जाने का अवसर मिले जो आंध्र प्रदेश की राजधानी है, तो आप शायद 400 साल पुराने भव्‍य और प्रभावशाली गोलकोंडा किले को देखने का मोह नहीं छोड़ सकेंगे जो शहर के पश्चिमी सिरे पर स्थित है। यह किला तेरहवीं शताब्‍दी में काकतिया राजवंश द्वारा निर्मित किया गया था।

भारत का सर्वाधिक असाधारण स्‍मारक माना जाने वाला गोलकोंडा किला अपने समय की ''नवाबी'' संस्‍कृति का अद्भुत चित्रण करता है। ''चरवाहे की पहाड़ी'' या ''गोला कोंडा'', जिसे तेलुगु में लोकप्रिय रूप से यह नाम दिया गया है और इसके साथ एक रोचक इतिहास जुड़ा हुआ है। एक दिन एक चरवाहा बालक पहाड़ी पर एक मूर्ति पा गया, जिसे मंगलावरम कहा गया था। यह समाचार तत्‍कालीन शासक काकतिया राजा तक पहुंचा। राजा ने उस पवित्र स्थान के चारों ओर मिट्टी का एक किला बनवा दिया और उनके उत्तरवर्तियों ने भी इस प्रथा को जारी रखा।

आगे चलकर गोलकोंडा का किला बहमनी राजवंश के अधिकार में आ गया। कुछ समय बाद कुतुब शाही राजवंश ने इस पर कब्‍जा किया और गोलकोंडा को अपनी राजधानी बनाया। गोलकोंडा के किले में मोहम्‍मद कुल कुतुब शाह के समय की अधिकांश भव्‍यता अभी बची हुई है। इसके पश्‍चात की पीढियों ने गोलकोंडा किले को कई तरह से संपुष्‍ट किया और इसके अंदर एक सुंदर शहर का निर्माण कराया। गोलकोंडा किले को 17वीं शताब्‍दी तक हीरे का एक प्रसिद्ध बाजार माना जाने लगा। इससे दुनिया को कुछ सर्वोत्तम ज्ञात हीरे मिले, जिसमें ''कोहिनूर'' शामिल है। इसकी वास्‍तुकला के बारीक विवरण और धुंधले होते उद्यान, जो एक समय हरे भरे लॉन और पानी के सुंदर फव्‍वारों से सज्जित थे, आपको उस समय की भव्‍यता में वापस ले जाते हैं। गोलकोंडा किले की भव्‍य वास्‍तुकला चिर स्‍थायी है और यह बात प्रवेश द्वार पर बने सुंदर और मजबूत लोहे की बड़ी छड़ों से स्‍पष्‍ट हो जाती है जो इस पर आक्रमण करने वाली सेनाओं को इससे टकराने से भय पैदा करती हैं। इस प्रवेश द्वार के आगे पोर्टिको है, जिसे बाला हिस्‍सार गेट कहते हैं और यह प्रवेश द्वार अत्‍यंत भव्‍य है।

आप यहां आकर आधुनिक श्रव्‍य प्रणाली के प्रभाव से चकित रह जाएंगे जो इस प्रकार बनाई गई है कि हाथ से बजाई गई ताली की आवाज़ बाला हिस्‍सार गेट से गूंजते हुए किले में सुनाई देती है। वास्‍तुकारों की अद्भुत योजना यहां हवा के आने जाने की दिशा से स्‍पष्‍ट हो जाती है, जो इस प्रकार डिज़ाइन की गई है कि यहां ठण्‍डी ताजा हवा के झोंके सदा बहते रहते हैं चाहे बाहर आंध्र प्रदेश की तीखी नम गर्मी जारी हो।

यहां स्थित रॉयल नगीना गार्डन भी एक देखने लायक स्‍थान है, साथ ही अंगरक्षकों का बैरक और पानी के तीन तालाब जो 12 मीटर गहरे हैं, जो एक बार बनने के बाद किले में पानी के आंतरिक स्रोत रहे। किले की शानदार भव्‍यता यहां का दरबार हॉल देख कर समझी जा सकती है, जो हैदराबाद और सिकंदराबाद के दोनों शहरों पर नजर रखते हुए पहाड़ी की छोटी पर बनाया गया है। यहां एक हज़ार सीढियां चढ़ कर पहुंचा जा सकता है और यदि आप यहां चढ़ने का काम पूरा कर लेते हैं तो आपको नीचे प्रसिद्ध चार मीनार का सुंदर दृश्‍य दिखाई देता है।

गोलकोंडा किले के बाहर पत्‍थरीली पहाडियों पर तारामती गान मंदिर और प्रेमनाथ नृत्‍य मंदिर नामक दो अलग अलग मंडप हैं, जहां प्रसिद्ध बहनें तारामती और प्रेममती रहती थीं। वे कला मंदिर नामक दो मंजिला इमारत के शीर्ष पर बने एक गोलाकार मंच पर नृत्‍य कला का प्रदर्शन करती थीं, जो राजा के दरबार से दिखाई देता था। कला मंदिर की भव्‍यता को दोबारा जीवित करने के प्रयास जारी हैं जो अब कुछ भग्‍नावस्‍था में पहुंच गया है। इसके लिए दक्षिण कला महोत्‍सव का वार्षिक आयोजन किया जाता है। सुंदर गुम्‍बद वाला कुतुबशाही गुम्‍बद किले के पास इस्‍लामी वास्‍तुकला का अनोखा नमूना प्रस्‍तुत करता है।

किले का एक आकर्षण यहां होने वाला ध्‍वनि और प्रकाश का कार्यक्रम है जिसमें गोलकोंडा के इतिहास को सजीव रूप में प्रस्‍तुत किया जाता है। दृश्‍य और श्रव्‍य प्रभावों के विहंगम प्रस्‍तुतिकरण से गोलकोंडा की कहानी आपको कई सदियों पुराने भव्‍य इतिहास में ले जाती है। यह कार्यक्रम सप्‍ताह के एक दिन छोड़कर अगले दिन के अंतराल पर अंग्रेजी और तेलुगु में प्रस्‍तुत किया जाता है। गोलकोंडा का किला भारतीय सेना की गोलकोंडा सशस्‍त्र सेना के मौजूदा समय में गर्व से खड़ा है, जो आज यहां उपस्थित है।

                                                            स्‍वर्ण मंदिर


श्री हरमंदिर साहिब को श्री दरबार साहिब या स्‍वर्ण मंदिर भी कहा जाता है (इसके आस पास के सुंदर परिवेश और स्‍वर्ण की पर्त के कारण) और यह अमृतसर (पंजाब) में स्थित सिक्‍खों का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता है। यह मंदिर सिक्‍ख धर्म का सहनशीलता तथा स्‍वीकार्यता का संदेश अपनी वास्‍तुकला के माध्‍यम से प्रवर्तित करता है, जिसमें अन्‍य धर्मों के संकेत शामिल किए गए हैं। दुनिया भर के सिक्‍ख श्री अमृतसर आना चाहते हैं और श्री हरमंदिर साहिब में अपनी अरदास देकर अपनी श्रद्धा व्‍यक्‍त करना चाहते हैं।

गुरु अर्जन साहिब, पांचवें नानक, ने सिक्‍खों की पूजा के एक केन्‍द्रीय स्‍थल के सृजन की कल्‍पना की और उन्‍होंने स्‍वयं श्री हरमंदिर साहिब की वास्‍तुकला की संरचना की। पहले इसमें एक पवित्र तालाब (अमृतसर या अम़ृत सरोवर) बनाने की योजना गुरू अमरदास साहिब द्वारा बनाई गई थी, जो तीसरे नानक कहे जाते हैं किन्‍तु गुरू रामदास साहिब ने इसे बाबा बुद्ध जी के पर्यवेक्षण में निष्‍पादित किया। इस स्‍थल की भूमि मूल गांवों के जमींदारों से मुफ्त या भुगतान के आधार पर पूर्व गुरू साहिबों द्वारा अर्जित की गई थी। यहां एक कस्‍बा स्‍थापित करने की योजना भी बनाई गई थी। अत: सरोवर पर निर्माण कार्य के साथ कस्‍बों का निर्माण भी इसी के साथ 1570 में शुरू हुआ। दोनों परियोजनाओं का कार्य 1577 ए.डी. में पूरा हुआ था।

गुरू अर्जन साहिब ने लाहौर के मुस्लिम संत हजरत मियां मीर जी द्वारा इसकी आधारशिला रखवाई जो दिसम्‍बर 1588 में रखी गई। इसके निर्माण कार्य का पर्यवेक्षण गुरू अर्जन साहिब ने स्‍वयं किया और बाबा बुद्ध जी, भाई गुरूदास जी, भाई सहलो जी और अन्‍य कई समर्पित सिक्‍ख बंधुओं के द्वारा उन्‍हें सहायता दी गई।

ऊंचे स्‍तर पर ढांचे को खड़ा करने के विपरीत, गुरू अर्जन साहिब ने इसे कुछ निचले स्‍तर पर बनाया और इसे चारों ओर से खुला रखा। इस प्रकार उन्‍होंने एक नए धर्म सिक्‍ख धर्म का संकेत सृजित किया। गुरू साहिब ने इसे जाति, वर्ण, लिंग और धर्म के आधार पर किसी भेदभाव के बिना प्रत्‍येक व्‍यक्ति के लिए सुगम्‍य बनाया।

इसका निर्माण कार्य सितम्‍बर 1604 में पूरा हुआ। गुरू अर्जन साहिब ने नव सृजित गुरू ग्रंथ साहिब (सिक्‍ख धर्म की पवित्र पुस्‍तक) की स्‍थापना श्री हरमंदिर साहिब में की तथा बाबा बुद्ध जी को इसका प्रथम ग्रंथी अर्थात गुरू ग्रंथ साहिब का वाचक नियुक्‍त किया। इस कार्यक्रम के बाद "अथ सत तीरथ" का दर्जा देकर यह सिक्‍ख धर्म का एक अपना तीर्थ बन गया।

श्री हरमंदिर साहिब का निर्माण सरोवर के मध्‍य में 67 वर्ग फीट के मंच पर किया गया है। यह मंदिर अपने आप में 40.5 वर्ग फीट है। उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम चारों दिशाओं में इसके दरवाज़े हैं। दर्शनी ड्योढ़ी (एक आर्च) इसके रास्‍ते के सिरे पर बनी हुई है। इस आर्च का दरवाजे का फ्रेम लगभग 10 फीट ऊंचा और 8 फीट 4 इंच चौड़ा है। इसके दरवाजों पर कलात्‍मक शैली ने सजावट की गई है। यह एक रास्‍ते पर खुलता है जो श्री हरमंदिर साहिब के मुख्‍य भवन तक जाता है। यह 202 फीट लंबा और 21 फीट चौड़ा है।

इसका छोटा सा पुल 13 फीट चौड़े प्रदक्षिणा (गोलाकार मार्ग या परिक्रमा) से जोड़ा है। यह मुख्‍य मंदिर के चारों ओर घूमते हुए "हर की पौड़ी" तक जाता है। "हर की पौड़ी" के प्रथम तल पर गुरू ग्रंथ साहिब की सूक्तियां पढ़ी जा सकती हैं।

इसके सबसे ऊपर एक गुम्‍बद अर्थात एक गोलाकार संरचना है जिस पर कमल की पत्तियों का आकार इसके आधार से जाकर ऊपर की ओर उल्‍टे कमल की तरह दिखाई देता है, जो अंत में सुंदर "छतरी" वाले एक "कलश" को समर्थन देता है।

इसकी वास्‍तुकला हिन्‍दु तथा मुस्लिम निर्माण कार्य के बीच एक अनोखे सौहार्द को प्रदर्शित करता है तथा इसे विश्‍व के सर्वोत्तम वास्‍तुकलात्‍मक नमूने के रूप में माना जा सकता है। यह कई बार कहा जाता है कि इस वास्‍तुकला से भारत के कला इतिहास में सिक्‍ख प्रदाय की एक स्‍वतंत्र वास्‍तुकला का सृजन हुआ है। यह मंदिर कलात्‍मक सौंदर्य और गहरी शांति का उल्‍लेखनीय संयोजन है। यह कहा जा सकता है कि प्रत्‍येक सिक्‍ख का हृदय यहां बसता है।

                                                   हम्‍पी में स्‍मारकों का समूह


चौदहवीं शताब्‍दी के दौरान मध्‍य कालीन भारत के महानतम साम्राज्‍यों में से एक, विजयनगर साम्राज्‍य की राजधानी, हम्‍पी कर्नाटक राज्‍य के दक्षिण में स्थित है। हम्‍पी के चौंदहवीं शताब्‍दी के भग्‍नावशेष यहां लगभग 26 वर्ग किलो मीटर के क्षेत्र में फैले पड़े हैं, इनमें विशालकाय स्‍तंभ और वनस्‍पति शामिल है। उत्तर में तुंगभद्रा नदी और अन्‍य तीन ओर पत्‍थरीले ग्रेनाइट के पहाडों से सुरक्षित ये भग्‍नावशेष मौन रह कर अपनी भव्‍यता, विशालता अद्भुत संपदा की कहानी कहते हैं। महलों और टूटे हुए शहर के प्रवेश द्वारा की गरिमा मनुष्‍य की असीमित प्रतिभा तथा रचनात्‍मक की शक्ति की कहानी कहती है जो मिलकर संवेदनाहीन विनाश की क्षमता भी दर्शाती है।

विजय नगर शहर के स्‍मारक विद्या नारायण संत के सम्‍मान में विद्या सागर के नाम से भी जाने जाते हैं, जिन्‍होंने इसे 1336 - 1570 ए. डी. के बीच हरीहर - 1 से सदाशिव राय की अवधियों में निर्मित कराए। इस राजवंश के महानतम शासक कृष्‍ण देव राय (एडी 1509 - 30) द्वारा बड़ी संख्‍या में शाही इमारतें बनवाई गई।

इस अवधि में हिन्‍दू धार्मिक कला, वास्‍तुकला को एक अप्रत्‍याशित पैमाने पर दोबारा उठते हुए देखा गया। हम्‍पी के मंदिरों को उनकी बड़ी विमाओं, फूलदार सजावट, स्‍पष्‍ट और कोमल पच्‍चीकारी, विशाल खम्‍भों, भव्‍य मंडपों और मूर्ति कला तथा पारम्‍परिक चित्र निरुपण के लिए जाना जाता है, जिसमें रामायण और महाभारत के विषय शामिल है।

हम्‍पी में स्थित विठ्ठल मंदिर विजय नगर शैली का एक उत्‍कृष्‍ट उदाहरण है। देवी लक्ष्‍मी, नरसिंह और गणेश की एक पत्‍थर से बनी मूर्तियां अपनी विशालता और भव्‍यता के लिए उल्‍लेखनीय है। यहां स्थित कृष्‍ण मंदिर, पट्टाभिराम मंदिर, हजारा राम चंद्र और चंद्र शेखर मंदिर भी यहां के जैन मंदिर हैं जो अन्‍य उदाहरण हैं। हम्‍पी के अधिकांश मंदिरों में कई स्‍तर वाले मंडपों के बगल में व्‍यापक रूप से फैले बाजार हैं।

धार्मिक प्रवेश द्वारा के बीच जनाना संलग्‍नक का उल्‍लेख भी आवश्‍यक है जिसमें रानी के महल का विशालकाय पत्‍थरीला तहखाना और एक सजावटी मंडप ''कमल महल'' हैं जो यहां के ऐश्‍वर्य पूर्ण अंत:पुर की कहानी कहती हैं। ऊंची इमारतों के कोने वाले स्‍तंभ, धन नायक के संलग्‍नक (खजाना) महा नवमी दिवा में सुंदर शिल्‍पकारी के पैनल, कई प्रकार के तालाब और पोखर, मंडप, हाथी का अस्‍तबल और खम्‍भे युक्‍त मंडपों की कतारें हैं, जो हम्‍पी के महत्‍वपूर्ण वास्‍तुकलात्‍मक अवशेष हैं।

हम्‍पी ने हाल में की गई खुदाई से बड़ी संख्‍या में संकुलों और अनेक मंचों के तहखाना को सामने लाया गया है। इसमें पाई गई रोचक जानकारियों में पत्‍थर की बनी हुई छवियां, टेराकोटा से बनी सुंदर वस्‍तुएं और स्टूको आकृतियां हम्‍पी के महल में बिखरी पड़ी हैं।

इसके अतिरिक्‍त सोने और तांबे के सिक्‍के, घरेलू बर्तन, चौकोर सीढियों वाले सरोवर महा नवमी दिबा के दक्षिण पश्चिम में हैं और साथ ही यहां सिरामिक की बड़ी संख्‍या पाई गई है। यहां दूसरी और तीसरी शताब्‍दी ए. डी. के पोर्सलेन से बने विभिन्‍न प्रकार के बर्तन और बोध शिल्‍पकला के खुदाई के नमूने भी सामने आए।

                                                    जैसलमेर का किला


जैसलमेर के किले का निर्माण 1156 में किया गया था और यह राजस्‍थान का दूसरा सबसे पुराना राज्‍य है। ढाई सौ फीट ऊंचा और सेंट स्‍टोन के विशाल खण्‍डों से निर्मित 30 फीट ऊंची दीवार वाले इस किले में 99 प्राचीर हैं, जिनमें से 92 का निर्माण 1633 और 1647 के बीच कराया गया था। इस किले के अंदर मौजूद कुंए पानी का निरंतर स्रोत प्रदान करते हैं। रावल जैसल द्वारा निर्मित यह किला जो 80 मीटर ऊंची त्रिकूट पहाड़ी पर स्थित है, इसमें महलों की बाहरी दीवारें, घर और मंदिर कोमल पीले सेंट स्‍टोन से बने हैं। इसकी संकरी गलियां और चार विशाल प्रवेश द्वार है जिनमें से अंतिम एक द्वार मुख्‍य चौक की ओर जाता है जिस पर महाराज का पुराना महल है। इस कस्‍बे की लगभग एक चौथाई आबादी इसी किले के अंदर रहती है। यहां गणेश पोल, सूरज पोल, भूत पोल और हवा पोल के जरिए पहुंचा जा सकता है। यहां अनेक सुंदर हवेलियां और जैन मंदिरों के समूह हैं जो 12वीं से 15वीं शताब्‍दी के बीच बनाए गए थे।

                                        

       जामा मस्जिद (दिल्‍ली)


जामा मस्जिद अर्थात शुक्रवार की मस्जिद, दिल्‍ली दुनिया की सबसे बड़ी और संभवतया सबसे अधिक भव्‍य मस्जिद है। यह लाल किले के समाने वाली सड़क पर है। पुरानी दिल्‍ली की यह विशाल मस्जिद मुगल शासक शाहजहां के उत्‍कृष्‍ट वास्‍तुकलात्‍मक सौंदर्य बोध का नमूना है, जिसमें एक साथ 25,000 लोग बैठ कर प्रार्थना कर सकते हैं। इस मस्जिद का माप 65 मीटर लम्‍बा और 35 मीटर चौड़ा है, इसके आंगन में 100 वर्ग मीटर का स्‍थान है। 1656 में निर्मित यह मुगल धार्मिक श्रद्धा का एक विशिष्‍ट पुन: स्‍मारक है। इसके विशाल आंगन में हजारों भक्‍त एक साथ आकर प्रार्थना करते हैं।

इसे मस्जिद - ए - जहानुमा भी कहते हैं, जिसका अर्थ है विश्‍व पर विजय दृष्टिकोण वाली मस्जिद। इसे बादशाह शाहजहां ने एक प्रधान मस्जिद के रूप में बनवाया था। एक सुंदर झरोखेनुमा दीवार इसे मुख्‍य सड़क से अलग करती है।

पुरानी दिल्‍ली के प्राचीन कस्‍बे में स्थित यह स्‍मारक 5000 शिल्‍पकारों द्वारा बनाया गया था। यह भव्‍य संरचना भौ झाला पर टिकी है जो शाहजहांना बाद में मुगल राजधानी की दो पहाडियों में से एक है। इसके पूर्व में यह स्‍मारक लाल किले की ओर स्थि‍त है और इसके चार प्रवेश द्वार हैं, चार स्‍तंभ और दो मीनारें हैं। इसका निर्माण लाल सेंड स्‍टोन और सफेद संगमरमर की समानांतर खड़ी पट्टियों पर किया गया है। सफेद संगमरमर के बने तीन गुम्‍बदों में काले रंग की पट्टियों के साथ शिल्‍पकारी की गई है।

यह पूरी संरचना एक ऊंचे स्‍थान पर है ताकि इसका भव्‍य प्रवेश द्वार आस पास के सभी इलाकों से दिखाई दे सके। सीढियों की चौड़ाई उत्तर और दक्षिण में काफी अधिक है। चौड़ी सीढियां और मेहराबदार प्रवेश द्वार इस लोकप्रिय मस्जिद की विशेषताएं हैं। मुख्‍य पूर्वी प्रवेश द्वार संभवतया बादशाहों द्वारा उपयोग किया जाता था जो सप्‍ताह के दिनों में बंद रहता था। पश्चिमी दिशा में मुख्‍य प्रार्थना कक्ष में ऊंचे ऊंचे मेहराब सजाए गए हैं जो 260 खम्‍भों पर है और इनके साथ लगभग 15 संगमरमर के गुम्‍बद विभिन्‍न ऊंचाइयों पर है। प्रार्थना करने वाले लोग यहां अधिकांश दिनों पर आते हैं किन्‍तु शुक्रवार तथा अन्‍य पवित्र दिनों पर संख्‍या बढ़ जाती है। दक्षिण मीनारों का परिसर 1076 वर्ग फीट चौड़ा है जहां एक बार में 25,000 व्‍यक्ति बैठ कर नमाज़ अदा कर सकते हैं।

यह कहा जाता है कि बादशाह शाहजहां ने जामा मस्जिद का निर्माण 10 करोड़ रु. की लागत से कराया था और इसे आगरा में स्थित मोती मस्जिद की एक अनुकृति कहा जा सकता हैं। इसमें वास्‍तुकला शैली के अंदर हिन्‍दु और मुस्लिम दोनों ही तत्‍वों का समावेश है।

जीवन का एक संपूर्ण मार्ग इस पुराने ऐतिहासिक स्‍मारक की छाया में, इसकी सीढियों पर, इसकी संकरी गलियों में भारत के लघु ब्रह्मान्‍ड का एक सारतत्‍व मिलता है जो भारत की समृद्ध सांस्‍कृतिक विरासत की कहानी कहता है।


                                                 कामाख्‍या मंदिर


कामाख्‍या मंदिर, जो नीलाचल पर्वत या कामगिरी पर्वत पर गुवाहाटी शहर में पहाड़ी की ऊंची चोटी पर स्थित है, अनेक धार्मिक स्‍थलों में से एक है, जो असम राज्‍य के समृद्ध ऐतिहासिक विवरण की कहानी स्‍वयं कहता है। यह पवित्र मंदिर असम शहर का हृदय है जो देखने वालों की आंखों को बांध लेता है। कामाख्‍या मंदिर का निर्माण देवी कामाख्‍या या सती के लिए किया गया था जो देवी दुर्गा या देवी शक्ति के अनेक अवतारों में से एक थीं।

यह मंदिर गुवाहाटी रेलवे स्‍टेशन से कुछ किलो मीटर की दूरी पर है और यह पूरे साल दर्शकों के लिए खुला रहता है। इस मंदिर के इतिहास के साथ एक कहानी जुड़ी हुई है, जो धार्मिक युग में हमें पीछे की ओर ले जाती है। इस कथा के अनुसार भगवान शिव क पत्‍नी सती (हिन्‍दु धर्म में एक पवित्र अवतार) ने अपना जीवन उस यज्ञ के आयोजन में समर्पित कर दिया जो उनके पिता दक्ष द्वारा आयोजित किया गया था, क्‍योंकि उन्‍होंने अपने पिता द्वारा अपने पति के अपमान को सहन नहीं किया। यह समाचार सुनने पर कि उनकी पत्‍नी की मृत्‍यु हो गई है, भगवान शिव जो सभी का नाश भी कर सकते हैं, आवेश में आए और उन्‍होंने दक्ष को दण्‍ड दिया तथा उनके सिर के स्‍थान पर बकरे का सिर लगा दिया। दुख और आवेश से पीडित शिव ने अपनी पत्‍नी सती का शरीर उठाया और विनाश का नृत्‍य अर्थात तांडव किया। विनाशकर्ता का आवेश इतना सघन था कि अनेक देवता उनके क्रोध को शांत करने के लिए तत्‍पर हुए। इस संघर्ष के बीच में भगवान विष्‍णु के हाथ में स्थित चक्र से सती के पार्थिव शरीर के 51 हिस्‍से हो गए (जो हिन्‍दु धर्म में एक अन्‍य महत्‍वपूर्ण देवता हैं) और उनका प्रजनन अंग या योनि उस स्‍थान पर गिरी जहां आज कामाख्‍या मंदिर स्थित है और आज यह उनके शरीर के अन्‍य हिस्‍सों के साथ एक शक्ति पीठ बन गया है।

कूच बिहार के राजा नर नारायण ने 1665 में इस मंदिर का दोबारा निर्माण कराया, जब इस पर विदेशी आक्रमणकारियों ने हमला कर नुकसान पहुंचाया। इस मंदिर में सात अण्‍डाकार स्‍पायर हैं, जिनमें से प्रत्‍येक पर तीन सोने के मटके लगे हुए हैं और प्रवेश द्वारा सर्पिलाकार है जो एक घुमावदार रास्‍ते से थोड़ी दूर पर खुलता है, जो विशेष रूप से मुख्‍य सड़क को मंदिर से जोड़ता है। मंदिर के शिल्‍पकला से बनाए गए कुछ पैनलों पर प्रसन्‍नता की स्थिति में कुछ हिन्‍दु देवी और देवताओं के चित्र हैं। कच्‍छुए, बंदर और बड़ी संख्‍या में कबूतरों ने इस मंदिर को अपना घर बनाया है तथा ये इसके परिसर में घुमते रहते हैं, जिन्‍हें मंदिर के प्राधिकारियों द्वारा तथा दर्शकों द्वारा भोजन कराया जाता है। मंदिर का शांत और कलात्‍मक वातावरण कुल मिलाकर दर्शकों के मन को एक अनोखी शांति देता है और उनके मन में एक सात्विक भावना उत्‍पन्‍न होती है, यही कारण है कि यहां काफी लोग आते हैं।

इसकी रहस्‍यमय भव्‍यता और देखने योग्‍य स्‍थान के साथ कामाख्‍या मंदिर न केवल असम बल्कि पूरे भारत का चकित कर देने वाला मंदिर है।

                                           काशी विश्‍वनाथ मंदिर, वाराणसी


वाराणसी को बनारस तथा काशी के नाम से ही जाना जाता है जो उत्तर प्रदेश राज्‍य के उत्तरी भारत में प्रमुख शहर है। पवित्र नदी गंगा के किनारे स्थित इस शहर का हिन्‍दुओं के लिए अत्‍यंत धार्मिक महत्‍व है। वाराणसी काशी विश्‍वनाथ मंदिर का घर है जो भगवान शिव का समर्पित है। इसमें बारह ज्‍योतिर्लिंगों में से एक स्‍थापित हैं। ऐसा कहा जाता है कि यह मंदिर कई बार बनाया गया। नवीनतम संरचना जो आज यहां दिखाई देती है वह 18वीं शताब्‍दी में बनी थीं। हजारों धार्मिक यात्री यहां पवित्र ज्‍योतिर्लिंगम के दर्शन करने के लिए उनके अभिषेक के अवसर पर यहां जमा होते हैं, जिसमें गंगा नदी का पानी लिया जाता है।

इसके धार्मिक महत्‍व के अलावा यह मंदिर वास्‍तुकला की दृष्टि से भी अनुपम है। इसका भव्‍य प्रवेश द्वार देखने वालों की दृष्टि में मानो बस जाता है। ऐसा कहा जाता है कि एक बार इंदौर की रानी अहिल्‍या बाई होलकर के स्‍वप्‍न में भगवान शिव आए। वे भगवान शिव की भक्‍त थीं और इसलिए उन्‍होंने 1777 में यह मंदिर निर्मित कराया।

विश्‍वनाथ खण्‍ड को पुरान शहर भी कहा जाता है जो दशाश्‍व मेध घाट और गोदुलिया के बीच मणिकर्णिका घाट के दक्षिण और पश्चिम तक नदी की उत्तर दिशा में वाराणसी के मध्‍य स्थित है। यह पूरा क्षेत्र ही घूमने योग्‍य है जहां अनेक मठ और लिंग हर कोने में दिखाई देते हैं और यहां धार्मिक यात्रियों, पंडों की गतिविधियां तथा भक्‍तों को मंदिर में अर्पित करने की सामग्री की दुकानें बड़ी संख्‍या में हैं।

स‍करी गलियों से विश्‍वनाथ गली तक पहुंचते हुए यह विश्‍वनाथ या विश्‍वेश्‍वर मंदिर ''सभी के भगवान'' माने जाते हैं और इसके शिखर पर स्‍वर्ण लेपन होने के कारण इसे स्‍वर्ण मंदिर भी कहते हैं। परिसर के अंदर, जो एक दीवार के पीछे छुपा है और यहां एक अत्‍यंत अनोखे प्रकार के द्वार से पहुंचा जाता है, जो भारत का सबसे महत्‍वपूर्ण शिवलिंग है और यह चिकने काले पत्‍थर से बना हुआ है और इसे ठोस चांदी के आधार में रखा गया है। महाकाल और दण्‍ड पाणी के क्रुद्ध संरक्षकों के आश्रम और अविमुक्‍तेश्‍वर के लिंग भी इस मंदिर के संकुल में हैं।

यहां भक्‍त जन आकर संकल्‍प करते हैं और पंच तीर्थ यात्रा शुरू करने के पहले अपने मन की भावना यहां व्‍यक्‍त करते हैं। मुख्‍य सड़क पर कुछ उत्तर दिशा में 13वीं शताब्‍दी में बनी रजिया की मस्जिद दिखाई देती है जो पूर्व विश्‍वनाथ मंदिर के भग्‍नावशेषों के साथ खड़ी है।

वाराणसी एक ऐसा स्‍थान कहा जाता है जहां प्रथम ज्‍योतिर्लिंग है, शिव द्वारा प्रकाश के उज्‍जवल स्‍तंभ से अन्‍य देवाओं पर उनकी श्रेष्‍ठता प्रदर्शित होती है जो पृथ्‍वी की पर्त तोड़ कर निकली और स्‍वर्ग की ओर इसकी ज्‍वाला गई। यहां घाटों और गंगा नदी के अलावा मंदिर में स्‍थापित शिव लिंग वाराणसी का धार्मिक आकर्षण बना हुआ है।


                                                       सांची में बौद्ध स्‍तूप


सांची, जिसे काकानाया, काकानावा, काकानाडाबोटा तथा बोटा श्री पर्वत के नाम से प्राचीन समय में जाना जाता था और अब यह मध्‍य प्रदेश राज्‍य में स्थित है। यह ऐतिहासिक तथा पुरातात्विक महत्‍व वाला एक धार्मिक स्‍थान है। सांची अपने स्‍तूपों, एक चट्टान से बने अशोक स्‍तंभ, मंदिरों, मठों तथा तीसरी शताब्‍दी बी. सी. से 12वीं शताब्‍दी ए. बी. के बीच लिखे गए शिला लेखों की संपदा के लिए विश्‍व भर में प्रसिद्ध है।

सांची के स्‍तूप अपने प्रवेश द्वारा के लिए उल्‍लेखनीय है, इनमें बुद्ध के जीवन से ली गई घटनाओं और उनके पिछले जन्‍म की बातों का सजावटी चित्रण है। जातक कथाओं में इन्‍हें बोधि सत्‍व के नाम से वर्णित किया गया है। यहां गौतम बुद्ध को संकेतों द्वारा निरुपित किया गया है जैसे कि पहिया, जो उनकी शिक्षाओं को दर्शाता है।

सांची को 13वीं शताब्‍दी के बाद 1818 तक लगभग भुला ही दिया गया था, जब जनरल टेलर, एक ब्रिटिश अधिकारी ने इन्‍हें दोबारा खोजा, जो आधी दबी हुई और अच्‍छी तरह संरक्षित अवस्‍था में था। बाद में 1912 में सर जॉन मार्शल, पुरातत्‍व विभाग के महानिदेशक में इस स्‍थल पर खुदाई के कार्य का आदेश दिया।

शूंग के समय में सांची में और इसकी पहाडियों के आस पास अनेक मुख द्वार तैयार किए गए थे। यहां अशोक स्‍तूप पत्‍थरों से बड़ा बनाया गया और इसे बालू स्‍ट्रेड, सीढियों और ऊपर हर्मिका से सजाया गया। चालीस मंदिरों का पुन: निर्माण और दो स्‍तूपों को खड़ा करने का कार्य भी इसी अवधि में किया गया। पहली शताब्‍दी बी. सी. में आंध्र - 7 वाहन, जिसने पूर्वी मालवा तक अपना राज्‍य विस्‍तारित किया था, ने स्‍तूप 1 के नक्‍काशी दार मार्ग को नुकसान पहुंचाया। दूसरी से चौथी शताब्‍दी ए डी तक सांची तथा विदिशा कुषाणु और क्षत्रपों का राज्‍य था और इसके बाद यह गुप्‍त राजवंश के पास चला गया। गुप्त काल के दौरान कुछ मंदिर निर्मित किए गए और इसमें कुछ शिल्‍पकारी जोडी गई।

सबसे बड़ा स्‍तूप, जिसे महान स्‍तूप कहते हैं, चार नक्‍काशीदार प्रवेश द्वारों से घिरा हुआ है जिसकी चारों दिशाएं कुतुबनुमे की दिशाओं में हैं। इसके प्रवेश द्वार संभवतया 1000 एडी के आस पास बनाए गए। ये स्‍तूप विशाल अर्ध गोलाकार गुम्‍बद हैं जिनमें एक केन्‍द्रीय कक्ष है और इस कक्ष में महात्‍मा बुद्ध के अवशेष रखे गए थे। सांची के स्‍तूप के अवशेष बौद्ध वास्‍तुकला के विकास और तीसरी शताब्‍दी बी सी 12वीं शताब्‍दी ए डी के बीच उसी स्‍थान की शिल्‍पकला का दर्शाते हैं। इन सभी शिल्‍पकलाओं की एक सबसे अधिक रोचक विशेषता यह है कि यहां बुद्ध की छवि मानव रूप में क‍हीं नहीं है। इन शिल्‍पकारियों में आश्‍चर्यजनक जीवंतता है और ये एक ऐसी दुनिया दिखाती हैं जहां मानव और जंतु एक साथ मिलकर प्रसन्‍नता, सौहार्द और बहुलता के साथ रहते हैं। प्रकृति का सुंदर चित्रण अद्भुत है। महात्‍मा बुद्ध को यहां मानव से परे आकृतियों में सांकेतिक रूप से दर्शाया गया है। वर्तमान में यूनेस्‍को की एक परियोजना के तहत सांची तथा एक अन्‍य बौद्ध स्‍थल सतधारा की आगे खुदाई, संरक्षण तथा पर्यावरण का विकास किया जा रहा है।


                                      बेसिलिका ऑफ बोम जीसस (गोवा)




पणजी से पूर्व दिशा में 10 किलो मीटर की दूरी पर मांडोवी नदी के साथ पुराना गोवा कस्‍बा बसा हुआ है, जहां भारत के कुछ महान गिरजाघर हैं और इनमें सबसे अधिक लोकप्रिय और सबसे अधिक सम्‍मानित चर्च हैं, जिन्‍हें दुनिया भर के ईसाई मानते हैं और यह है बेसिलिका ऑफ बोम जीसस। शिशु जीसस को समर्पित बेसिलिका को अब वैश्विक विरासत स्‍मारक घोषित किया गया है। बोम जीसस का अर्थ है शिशु जीसस या अच्‍छा जीसस। कैथोलिक दुनिया में अच्‍छी तरह से प्रतिष्ठित सोलवीं शताब्‍दी के कैथेरल भारत के प्रथम अल्‍प वयस्‍क बेसिलिका हैं और इन्‍हें भारत में बारोक वास्‍तुकला का एक सर्वोत्तम उदाहरण माना जाता है। इसकी रूपरेखा में सरल पुनर्जीवन मानक दर्शाए गए हैं जबकि इसका विस्‍तार और सजावट अतुलनीय बारोक है। यह सुंदर संरचना, जिसमें सफेद संगमरमर लगाया गया है और जिसे भित्ति चित्रों और अंदरुनी शिल्‍प कला से सजाया गया है।

बेसिलिका में सेंट फ्रेंसिस जेवियर के पवित्र अवशेष रखे हैं जो गोवा के संरक्षक संत थे और उनकी मृत्‍यु 1552 में हुई थी। संत के नश्‍वर अवशेष कोसिमो डी मेडिसी III द्वारा चर्च को उपहार दिए गए, जो ट्यूस केनी के ग्रेंड ड्यू थे। अब यह शरीर कांच के बने हुए वायुरोधी कपन में रखा गया है जिसे सत्रहवीं शताब्‍दी के फ्लोरेंटाइम शिल्‍पकार, जीयोवानी बतिस्‍ता फोगिनी द्वारा चांदी के कास्‍केट में शिल्‍पकारी द्वारा रखा गया है। उनकी इच्‍छा के अनुसार उनके अंतिम अवशेष उनकी मृत्‍यु के वर्ष में गोवा लाए गए। यह कहा जाता है कि यहां लाते समय संत का शरीर उतना ही ताजा तरीन था जितना कि इसे कफन में रखते समय पाया गया था। यह अद्भुत चमत्‍कारी घटना दुनिया के हर कोने से लोगों को आने के लिए आकर्षित करती और उनके शरीर के दर्शन प्रत्‍येक दशक में एक बार कराए जाते हैं जब धार्मिक यात्री आ कर इसे देख सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस संत के पास घाव भरने की चमत्‍कारी शक्ति थी दुनिया भर से लोग आकर यहां प्रार्थना करते हैं। चांदी का कास्‍केट लोगों को दिखाने के लिए केवल एक बार नीचे लाया जाता है, अंतिम बार इसे 2004 में दिखाया गया था।

बारीकी से शिल्‍पकारी द्वारा बनाए गए बेसॉल्‍ट के नमूने इसे गोवा में सबसे सम़ृद्ध मुख द्वार बनाते हैं। इसकी रूपरेखा में सरल मानकों का उपयोग किया गया है जबकि इसके विस्‍तार और सज्‍जा में अतुलनीय बारोक कला झलकती है। संत जेवियर का मकबरा इटालियन कला (संगमरमर का आधार) और हिन्‍दू शिल्‍पकारी (चांदी का कास्‍केट) का अद्भुत मिश्रण है। विस्‍तारपूर्वक बनाए गए अल्‍तार लकड़ी, पत्‍थर, स्‍वर्ण और ग्रेनाइट में शिल्‍पकला और पच्‍चीकारी का सुंदर उदाहरण है। इसके खम्‍भों पर संगमरमर लगाया हुआ है और इनके अंदर कीमती पत्‍थर लगाए गए हैं। इस चर्च में संत फ्रेंसिस जेवियर के जीवन को दर्शाने वाले चित्र भी लगाए गए हैं। यहां आकर अतिथि गहरी आध्यात्मिकता और इस स्‍थान के जादू में डूब जाते हैं। हर वर्ष हज़ारों लोग इस केथेड्रल में आते हैं, विशेष रूप से दिसम्‍बर माह के दौरान। गोवा दर्शन का महत्‍व बेसिलिका को दे‍खे बिना अधूरा रह जाता है।
 

 

स्‍मारक

                                                      आगरे का किला


ताजमहल के उद्यानों के पास महत्‍वपूर्ण 16 वीं शताब्‍दी का मुगल स्‍मारक है, जिसे आगरे का लाल किला कहते हैं। यह शक्तिशाली किला लाल सैंड स्‍टोन से बना है और 2.5 किलोमीटर लम्‍बी दीवार से घिरा हुआ है, यह मुगल शासकों का शाही शहर कहा जाता है। इस किले की बाहरी मजबूत दीवारें अंदर एक स्‍वर्ग को छुपाए हुए हैं। इसमें अनेक विशिष्‍ट भवन हैं जैसे मोती मस्जिद - सफेद संगमरमर से बनी एक मस्जिद, जो एक त्रुटि रहित मोती जैसी है; दीवान ए आम, दीवान ए खास, मुसम्‍मन बुर्ज - जहां मुगल शासक शाह जहां की मौत 1666 ए. डी. में हुई, जहांगीर का महल और खास महल तथा शीश महल। आगरे का किला मुगल वास्‍तुकला का उत्‍कृष्‍ट उदाहरण है, यह भारत में यूनेस्‍को के विश्‍व विरासत स्‍थलों में से एक है।

आगरे के किले का निर्माण 1656 के आस पास शुरु हुआ, जब आरंभिक संरचना मुगल बादशाह अकबर ने निर्मित कराई, इसके बाद का कार्य उनके पोते शाह जहां ने कराया, जिन्‍होंने किले में सबसे अधिक संगमरमर लगवाया। यह किला अर्ध चंद्राकार, पूर्व दिशा में चपटा है और इसकी एक सीधी, लम्‍बी दीवार नदी की ओर जाती है। इस पर लाल सैंड स्‍टोन के दोहरे प्राचीर बने हैं, जिन पर नियमित अंतराल के बाद बेस्‍टन बनाए गए है। बाहरी दीवार के आस पास 9 मीटर चौड़ी मोट है। एक आगे बढ़ती 22 मीटर ऊंची अंदरुनी दीवार अपराजेय प्रतीत होती है। किले की रूपरेखा नदी के प्रवाह की दिशा में निर्धारित होती है, जो उन दिनों इसके बगल से बहती थी। इस का मुख्‍य अक्ष नदी के समानान्‍तर है और दीवारें शहर की ओर हैं।

इस किले में मूलत: चार प्रवेश द्वार थे, जिनमें से दो को आगे चलकर बंद कर दिया गया। आज दर्शकों को अमर सिंह गेट से प्रवेश करने की अनुमति है। जहांगीर महल पहला उल्‍लेखनीय भवन है जो अमर सिंह प्रवेश द्वार से आने पर अतिथि सबसे पहले देखते हैं। जहांगीर अकबर का बेटा था और वह मुगल सिंहासन का उत्तराधिकारी भी था। जहांगीर महल का निर्माण अकबर ने महिलाओं के लिए कराया था। यह पत्‍थरों का बना हुआ है और इसकी बाहरी सजावट सादगी वाली है। पत्‍थर के बड़े बाउल पर सजावटी पर्शियन पच्‍चीकारी की गई है, जो संभवतया सुगंधित गुलाब जल को रखने के लिए बनाया गया था। अकबर ने जहांगीर महल के पास अपनी मनपसंद रानी जोधा बाई के लिए एक महल का निर्माण भी कराया था।

शाहजहां द्वार निर्मित पूरी तरह से संगमरमर का बना हुआ खास महल विशिष्‍ट इस्‍लामिक - पर्शियन विशेषताओं का प्रदर्शन करता है। इनके साथ हिन्‍दु विशेषताओं की एक अद्भुत श्रृंखला भी मिश्रित की गई है जैसे कि छतरियां। इसे बादशाह का सोने का कमरा या आरामगाह माना जाता है। खास महल में सफेद संगमरमर की सतह पर चित्र कला का सबसे सफल उदाहरण दिया गया है। खास महल की बांईं ओर मुसम्‍मन बुर्ज है जिसका निर्माण शाहजहां ने कराया था। यह सुंदर अष्‍टभुजी स्‍तंभ एक खुले मंडप के साथ है। इसका खुलापन, ऊंचाइयां और शाम की ठण्‍डी हवाएं इसकी कहानी कहती है। यही वह स्‍थान है जहां शाहजहां ने ताज को निहारते हुए अंतिम सांसें ली थी।

शीश महल या कांच का बना हुआ महल हमाम के अंदर सजावटी पानी की अभियांत्रिकी का उत्‍कृ‍ष्‍टतम उदाहरण है। ऐसा माना जाता है कि हरेम या कपड़े पहनने का कक्ष और इसकी दीवारों में छोटे छोटे शीशे लगाए गए थे जो भारत में कांच मोजेक की सजावट का सबसे अच्‍छा नमूना है। शाह महल के दांईं ओर दीवान ए खास है, जो निजी श्रोताओं के लिए है। यहां बने संगमरमर के खम्‍भों में सजावटी फूलों के पैटर्न पर अर्ध कीमती पत्‍थर लगाए गए हैं। इसके पास मम्‍मम ए शाही या शाह बुर्ज को गरमी के मौसम में उपयोग किया जाता था।

दीवान ए आम का उपयोग प्रसिद्ध मयूर सिंहासन को रखने में किया जाता था, जिसे शाहजहां द्वारा दिल्‍ली राजधानी ले जाने पर इसे लालकिले में ले जाया गया। यह सिंहासन सफेद संगमरमर से बना हुआ उत्‍कृष्‍ट कला का नमूना है। नगीना मस्जिद का निर्माण शाहजहां ने कराया था, जो दरबार की महिलाओं के लिए एक निजी मस्जिद थी। मोती मस्जिद आगरा किले की सबसे सुंदर रचना है। यह भवन वर्तमान में दर्शकों के लिए बंद किया गया है। मोती मस्जिद के पास मीना मस्जिद है, जिसे शाहजहां ने केवल अपने निजी उपयोग के लिए निर्मित कराया था।


                                                         सेंट केथेड्रल


गोवा की सबसे पुरानी और प्रतिष्ठित धार्मिक इमारतों में से यह भव्‍य 16वीं शताब्‍दी का स्‍मारक है, जिसे पुर्तगाल शासन के दौरान रोमन केथोलिक द्वारा बनाया गया था। यह एशिया का सबसे बड़ा चर्च है। यह केथेड्रल एलेक्‍सेंड्रिया के सेंट केथेरिन को समर्पित है, जिनके भोज्‍य दिवस पर 1510 में अल्‍फोंसो अल्‍बूकर्क ने मुस्लिम सेना को पराजित किया और गोवा शहर का स्‍वामित्‍व लिया। अत: इसे सेंट केथेरिन का केथेड्रल भी कहते हैं और यह पुर्तगाल में बने किसी भी चर्च से बड़ा है।

इस केथेड्रल को पुर्तगाली वाइसराय, रिडोंडो ने ''पुर्तगाल के एक विशाल चर्च, जहां संपत्ति, शक्ति और प्रसिद्धि हो, एक ऐसे रूप में स्‍थापित किया था, जो अटलांटिक से प्रशांत महासागर त‍क समुद्र पर कब्‍जा कर सके। इसके विशाल मुक्‍त द्वार का निर्माण 1562 में राजा डोम सेबास्टियो (1557-78) और इसे 1619 में काफी हद तक पूरा‍ किया गया था। यह 1640 में इसे अर्पित किया गया था।

यह चर्च 250 फीट लंबा और 181 फीट चौड़ा है। इसका अगला हिस्‍सा 115 फीट ऊंचा है। यह भवन पुर्तगाली - गोथिक शैली में टस्‍कन बाह्य सज्‍जा तथा कोरिंथयन अंदरुनी सज्‍जा के साथ बनाया गया है। केथेड्रल का बाह्य हिस्‍सा शैली की सादगी के लिए उल्‍लेखनीय है, जबकि इसकी अंदरुनी सजावट अपनी सुंदर भव्‍यता से दर्शकों का मन मोह लेती है।

केथेड्रल के स्‍तंभ गृह में प्रसिद्ध घंटा है जो गोवा में सबसे बड़ा तथा विश्‍व में एक सर्वोत्तम कृति माना जाता है, जिसे बहुधा अपनी शानदार आवाज के लिए ''स्‍वर्ण घंटी'' कहा जाता है। यहां मुख्‍य पूजा स्‍थल अलेक्सेंड्रिया के सेंट केथेरिन को समर्पित है और यहां दोनों ओर लगी तस्‍वीरें उनके जीवन तथा निर्माण के दृश्‍य प्रदर्शित करती हैं।

नेव की दांईं ओर चमत्‍कारों का चेपल ऑफ क्रॉस बना हुआ है। ईसा मसीह की एक झलक इस विशाल, सादे क्रॉस पर 1919 में प्रकट होने का उल्‍लेख है। मुख्‍य पूजा गृह में विशाल सोने का आवरण चढ़े हुए वेदी पटल हैं। सेंट केथेरिन के जीवन के दृश्‍य, जिन्‍हें यह केथेड्रल समर्पित है, इसके 6 मुख्‍य पैनलों पर तराशे गए हैं। बांईं ओर के कक्ष में 1532 के दौरान बपतिस्‍मा के अक्षर बनाए गए हैं। सेंट फ्रांसीस जेवियर के बारे में कहा जाता है कि इसे इबारत को पढ़ कर उन्‍होंने हजारों गोवावासियों का बपतिस्‍मा किया है।

यहां दुनिया भर से हजारों -लाखों लोग आते हैं और इस चर्च को सभी धर्मों के लोगों द्वारा एक धार्मिक स्‍थल माना जाता है। यह गोवा का एक अपरिहार्य पर्यटक आकर्षण है और गोवा जाने पर से' केथेड्रल को देखें बिना वापस आना यात्रा को अधूरा माना जाता है।

भारत एक नजर में

                                                    भारत एक नजर में
पृष्‍ठभूमि

भारत विश्‍व की सबसे पुरानी सम्‍यताओं में से एक है जिसमें बहुरंगी विविधता और समृद्ध सांस्‍कृतिक विरासत है। इसके साथ ही यह अपने-आप को बदलते समय के साथ ढ़ालती भी आई है। आज़ादी पाने के बाद पिछले 62 वर्षों में भारत ने बहुआयामी सामाजिक और आर्थिक प्रगति की है। भारत कृषि में आत्‍मनिर्भर बन चुका है और अब दुनिया के सबसे औद्योगीकृत देशों की श्रेणी में भी इसकी गिनती की जाती है। साथ ही उन चंद देशों में भी इसका शुमार होने लगा है, जिनके कदम चांद तक पहुंच चुके हैं। भारत का क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग कि.मी. है, जो हिमाच्‍छादित हिमालय की ऊंचाइयों से शुरू होकर दक्षिण के विषुवतीय वर्षा वनों तक फैला हुआ है। विश्‍व का सातवां बड़ा देश होने के नाते भारत शेष एशिया से अलग दिखता है जिसकी विशेषता पर्वत और समुद्र ने तय की है और ये इसे विशिष्‍ट भौगोलिक पहचान देते हैं। उत्तर में बृहत् पर्वत श्रृंखला हिमालय से घिरा यह कर्क रेखा से आगे संकरा होता जाता है। पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब सागर तथा दक्षिण में हिन्‍द महासागर इसकी सीमा निर्धारित करते हैं।

पूरी तरह उत्‍तरी गोलार्ध में स्थित भारत की मुख्‍यभूमि 8 डिग्री 4 मिनट और 37 डिग्री 6 मिनट उत्‍तरी अक्षांश और 68 डिग्री 7 मिनट तथा 97 डिग्री 25 मिनट पूर्वी देशान्‍तर के बीच स्थित है । उत्‍तर से दक्षिण तक इसकी अधिकतम लंबाई 3,214 कि.मी. और पूर्व से पश्चिम तक अधिकतम चौड़ाई 2,933 कि.मी. है। इसकी ज़मीनी सीमाओं की लंबाई लगभग 15,200 कि.मी. है। जबकि मुख्‍यभूमि, लक्षद्वीप और अण्‍डमान तथा निकोबार द्वीपसमूह की तटरेखा की कुल लम्‍बाई 7,516.6 कि.मी है।
भूगोल
भारत के बारे में भौगोलिक जानकारीब्यौरे विवरण
स्‍थान हिमालय द्वारा भारतीय पेनिसुला का मुख्‍य भूमि एशिया से अलग किया गया है। देश पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब सागर और दक्षिण में हिन्‍द महासागर से घिरा हुआ है।
भौगोलिक समन्‍वय यह पूर्ण रूप से उत्तरी गोलार्ध मे स्थित है, देश का विस्‍तार 8° 4' और 37° 6' l अक्षांश पर इक्‍वेटर के उत्तर में, और 68°7' और 97°25' देशान्‍तर पर है।
स्‍थायी मान समय जी एम टी + 05:30
क्षेत्र 3.3 मिलियन वर्ग किलोमीटर
देश का टेलीफोन कोड +91
सीमाओं में स्थित देश उत्तर पश्चिम में अफगानिस्‍तान और पाकिस्‍तान, भूटान और नेपाल उत्तर में; म्‍यांमार पूरब में, और पश्चिम बंगाल के पूरब में बंगलादेश। श्रीलंका भारत से समुद्र के संकीर्ण नहर द्वारा अलग किया जाता है जो पाल्‍क स्‍ट्रेट और मनार की खाड़ी द्वारा निर्मित है।
समुद्रतट 7,516.6 किलोमीटर जिसमें मुख्‍य भूमि, लक्षद्वीप, और अण्‍डमान और निकोबार द्वीपसमूह शामिल हैं।
जलवायु भारत की जलवायु को मोटे तौर पर उष्‍णकटिबंधीय मानसून के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। परन्‍तु भारत का अधिकांश उत्तरी भाग उष्‍णकटिबंधीय क्षेत्र के बाहर होने के बावजूद समग्र देश में उष्‍णकटिबंधीय जलवायु है जिसमें अपेक्षाकृत उच्‍च तापमान और सूखी सर्दी पड़ती है। चार मौसम है:
सर्दी (दिसम्‍बर-फरवरी)
गर्मी (मार्च-जून)
दक्षिण पश्चिम मानसून का मौसम (जून-सितम्‍बर)
मानसून पश्‍च मौसम (अक्‍तूबर-नवम्‍बर)
भूभाग मुख्‍य भूमि में चार क्षेत्र हैं नामत: ग्रेट माउन्‍टेन जोन, गंगा और सिंधु का मैदान, रेगिस्‍तान क्षेत्र और दक्षिणी पेनिंसुला।
प्राकृतिक संसाधन कोयला, लौह अयस्‍क, मैगनीज अयस्‍क, माइका, बॉक्‍साइट, पेट्रोलियम, टाइटानियम अयस्‍क, क्रोमाइट, प्राकृतिक गैस, मैगनेसाइट, चूना पत्‍थर, अराबल लेण्‍ड, डोलोमाइट, माऊलिन, जिप्‍सम, अपादाइट, फोसफोराइट, स्‍टीटाइल, फ्लोराइट आदि।
प्राकृतिक आपदा मानसूनी बाढ़, फ्लेश बाढ़, भूकम्‍प, सूखा, जमीन खिसकना।
पर्यावरण - वर्तमान मुद्दे वायु प्रदूषण नियंत्रण, ऊर्जा संरक्षण, ठोस अपशिष्‍ट प्रबंधन, तेल और गैस संरक्षण, वन संरक्षण, आदि।
पर्यावरण-अंतर्राष्‍ट्रीय करार पर्यावरण और विकास पर रीयो की घोषणा, जैव सुरक्षा पर कार्टाजेना प्रोटोकॉल, जलवायु परिवर्तन पर संयुक्‍त राज्‍य ढांचागत कार्य सम्‍मेलन के लिए क्‍योटो प्रोटोकॉल, विश्‍व व्‍यापार करार, नाइट्रोजन ऑक्‍साइड के सल्‍फर उत्‍पसर्जन को कम करने सर उनके ट्रांस बाउन्‍ड्री फ्लेक्‍सेस (नोन प्रोटोकॉल) पर एल आर टी ए पी हेन्सिंकी प्रोटोकॉल, वोलाटाइल ऑरगनिक समिश्रण या उनके ट्रांस बाऊन्‍ड्री फलाक्‍सेस (वी वो सी प्रोटोकॉल) के उत्‍सर्जन से संबंधित एल आर टी ए पी के लिए जेनेवा प्रोटोकॉल।
भूगोल-टिप्‍पणी भारत दक्षिण एशिया उप महाद्वीप के बड़े भूभाग पर फैला हुआ है।

व्‍यक्ति
भारतीय नागरिकों के बारे में सूचनाब्यौरे विवरण
(आबादी) जनसंख्‍या 1 मार्च, 2001 की स्थिति के अनुसार भारत की जनसंख्‍या 1,028 मिलियन (531.1 मि लियन पुरुष और 496.4 मिलियन महिला) की।
जनसंख्‍या वृद्धि दर औसत वार्षिक घातांकी वृद्धि दर वर्ष 1991-2001 के दौरान 1.93 प्रतिशत है।
जन्‍म दर वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार अनुमानित मृत्‍यु दर 24.8 है।
मृत्‍यु दर वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार अनुमानित जन्‍म दर 8.9 है।
संम्‍भावित जीवन दर 63.9 वर्ष (पुरुष) 66.9 वर्ष (महिला) (सितम्‍बर 2005 की स्थिति के अनुसार)
लिंग अनुपात 2001 की जनगणना के अनुसार 933
राष्‍ट्रीयता भारतीय
जातीय अनुपात सभी पांच मुख्‍य प्रकार की जातियां, ऑस्‍ट्रेलियाड, मोंगोलॉयड, यूरोपॉयड, कोकोसिन और नीग्रोइड को भारत की जनता के बीच प्रतिनिधित्‍व मिलती है।
धर्म वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार 1,028 मिलियन देश की कुल जनसंख्‍या में से 80.5 प्रतिशत के साथ हिन्‍दुओं की अधिकांशता है दूसरे स्‍थान पर 13.4 प्रतिशत की जनसंख्‍या वाले मुस्लिम इसके बाद ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और अन्‍य आते हैं।
भाषाएं भारतीय संविधान द्वारा 22 विभिन्न भाषाओं को मान्यता दी गई है, जिसमें हिन्दी आधिकारिक भाषा है। अनुच्छेद 343 (3) भारतीय संसद को विधि के अधीन कार्यालयीन उद्देश्यों के लिए अंग्रेजी के उपयोग को जारी रखने का अधिकार देता है।
साक्षरता 2001 की जनसंख्‍या के अनंतिम परिणाम के अनुसार देश मे साक्षरता दर 64.84 प्रतिशत है। 75.26 प्रतिशत पुरुषों के लिए और महिलाओं के लिए 53.67 है।

सरकार
भारत सरकार के बारे में सूचनाब्यौरे विवरण
देश का नाम रिपब्लिक ऑफ इंडिया; भारत गणराज्‍य
सरकार का प्रकार संसदीय सरकार पद्धति के साथ सामाजिक प्रजातांत्रिक गणराज्‍य।
राजधानी नई दिल्‍ली
प्रशासनिक प्रभाग 28 राज्‍य और 7 संघ राज्‍य क्षेत्र
आजादी 15 अगस्‍त 1947 (ब्रिटिश उपनिवेशीय शासन से)
संविधान भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ।
कानून प्रणाली भारत का संविधान देश की न्‍याय प्रणाली का स्रोत है।
कार्यपालिका शाखा भारत का राष्‍ट्रपति देश का प्रधान होता है, जबकि प्रधानंत्री सरकार प्रमुख होता है और मंत्रिपरिषद् की सहायता से शासन चलाता है जो मंत्रिमंडल मंत्रालय का गठन करते हैं।
विद्यायिका शाखा भारतीय वि‍द्यायिका में लोक सभा (हाउस ऑफ दि पीपल) और राज्‍य सभी (राज्‍य परिषद्) संसद के दोनों सदनों का गठन करते हैं।
न्‍यायपालिका शाखा भारत का सर्वोच्‍च न्‍यायालय भारतीय कानून व्‍यवस्‍था का शीर्ष निकाय है इसके बाद अन्‍य उच्‍च न्‍यायालय और अधीनस्थ न्‍यायालय आते हैं।
झण्‍डे का वर्णन राष्‍ट्रीय झण्‍डा आयताकार तिरंगा है जिसमें केसरिया ऊपर है, बीच में सफेद, और बराबर भाग में नीचे गहरा हरा है। सफेद पट्टी के केन्‍द्र में गहरा नीला चक्र है जो सारनाथ में अशोक चक्र को दर्शाता है।
राष्‍ट्रीय दिवस 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस)
15 अगस्‍त (स्‍वतंत्रता दिवस)
2 अक्‍तूबर (गांधी जयंती, महात्‍मा गांधी का जन्‍म दिवस)

अर्थव्‍यवस्‍था
भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के बारे में सूचनाब्यौरे विवरण
अर्थव्‍यवस्‍था सिंहावलोकन स्‍वतंत्रता की प्राप्ति के बाद आधी शताब्‍दी में भारत ने सभी बाधाओं को पार करते हुए आर्थिक स्थिरता का स्‍पष्‍ट स्‍तर, विभिन्‍न क्षेत्रों का शिष्‍टाचार, अदम्‍य सहयोग जैसाकि कृषि, पर्याटन, वाणिज्‍य, विद्युत, संचार, विज्ञान और प्रौद्योगिकी आदि। जिन्‍होंने भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के सतंभ के रूप में कार्य किया है। आज भारत विश्‍व की छह सबसे तेजी से विकसित अर्थव्‍यवस्‍था में से एक हैं। वर्ष 2001 में शाक्ति समकक्षता खरीदने (पीपीपी) की तर्ज पर भारत का चौथा स्थान है। व्‍यवसाय और विनियामक वातावरण विकसित हो राह है और स्‍थायी सुधार की ओर आगे बढ़ रहा है।
सकल घरेलू उत्‍पाद वर्ष 2005-06 की द्वितीय तिमाही में 8 प्रतिशत की वृद्धि दर दर्ज की गई।
सकल घरेलू उत्‍पाद खरीद शक्ति समकक्षता भारत चौथी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था है, खरीद शक्ति समकक्षता की तर्ज पर इसका जीडीपी 3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है। यह यूएसए, चीन और जापान के बाद आता है।
जीडीपी प्रति व्‍यक्ति सितम्‍बर, 2005 की स्थिति के अनुसार देश का प्रतिव्‍यक्ति सकल घरेलू उत्‍पाद 543 अमेरिकी डॉलर था।
जीडीपी क्षेत्रकों द्वारा निर्माण सेवाएं 56 प्रतिशत कृषि 22 प्रतिशत और उद्योग 22 प्रतिशत (सितम्‍बर, 2005 की स्थिति के अनुसार
श्रमिक बल इंडिया विजन : 2020 पर समिति की रिपोर्ट के अनुसार भारत का श्रमिक बल 2002 में 375 मिलियन से अधिक पहुंच गई है।
बेरोजगारी की दर 9.1% (सितम्‍बर 2005 के अनुसार)
गरीबी रेखा के नीचे जनसंख्‍या 1999-2000 को 26.10%
मुद्रास्‍फीति की दर जुलाई 2005 को 4.1%
सार्वजनिक ऋण 31 मार्च 2002 को कुल ऋण 72117.58 करोड़ रू है
विनियम दर विनिमय दरों के लिए प्रति दिन भारतीय रिजर्व बैंक(बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं) की वेबसाइट देखें
कृषि उत्‍पाद चावल, गेहूं, चाय, कपास, गन्‍ना, आलू, जूट, तिलहन, पोल्‍ट्री आदि
उद्योग इस्‍पात, वस्‍त्र, पेट्रोलियम, सीमेंट, मशीनरी, लोकोमोटिव, खाद्य प्रसंस्‍करण, भैषजिक उत्‍पाद, खनन आदि
मुद्रा (कोड) भारतीय रूपए (आईएनआर)
वित्‍तीय वर्ष 1 अप्रैल से 31 मार्च

Thursday, December 16, 2010

Common Awareness Program

                                                       India
भारत विश्‍व की सबसे पुरानी सम्‍यताओं में से एक है जिसमें बहुरंगी विविधता और समृद्ध सांस्‍कृतिक विरासत है। इसके साथ ही यह अपने-आप को बदलते समय के साथ ढ़ालती भी आई है। आज़ादी पाने के बाद पिछले 62 वर्षों में भारत ने बहुआयामी सामाजिक और आर्थिक प्रगति की है। भारत कृषि में आत्‍मनिर्भर बन चुका है और अब दुनिया के सबसे औद्योगीकृत देशों की श्रेणी में भी इसकी गिनती की जाती है। साथ ही उन चंद देशों में भी इसका शुमार होने लगा है, जिनके कदम चांद तक पहुंच चुके हैं। भारत का क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग कि.मी. है, जो हिमाच्‍छादित हिमालय की ऊंचाइयों से शुरू होकर दक्षिण के विषुवतीय वर्षा वनों तक फैला हुआ है। विश्‍व का सातवां बड़ा देश होने के नाते भारत शेष एशिया से अलग दिखता है जिसकी विशेषता पर्वत और समुद्र ने तय की है और ये इसे विशिष्‍ट भौगोलिक पहचान देते हैं। उत्तर में बृहत् पर्वत श्रृंखला हिमालय से घिरा यह कर्क रेखा से आगे संकरा होता जाता है। पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब सागर तथा दक्षिण में हिन्‍द महासागर इसकी सीमा निर्धारित करते हैं।


पूरी तरह उत्‍तरी गोलार्ध में स्थित भारत की मुख्‍यभूमि 8 डिग्री 4 मिनट और 37 डिग्री 6 मिनट उत्‍तरी अक्षांश और 68 डिग्री 7 मिनट तथा 97 डिग्री 25 मिनट पूर्वी देशान्‍तर के बीच स्थित है । उत्‍तर से दक्षिण तक इसकी अधिकतम लंबाई 3,214 कि.मी. और पूर्व से पश्चिम तक अधिकतम चौड़ाई 2,933 कि.मी. है। इसकी ज़मीनी सीमाओं की लंबाई लगभग 15,200 कि.मी. है। जबकि मुख्‍यभूमि, लक्षद्वीप और अण्‍डमान तथा निकोबार द्वीपसमूह की तटरेखा की कुल लम्‍बाई 7,516.6 कि.मी है।